महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता किसी भी लोकतांत्रिक समाज की मजबूती का महत्वपूर्ण आधार है। राजनीतिक प्रक्रिया में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी न केवल उनके अधिकारों और अवसरों का विस्तार करती है, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता तथा समावेशी विकास को भी प्रोत्साहित करती है। भारत में संविधान द्वारा महिलाओं को समान राजनीतिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। इसके बावजूद लंबे समय तक उनका प्रतिनिधित्व सीमित रहा। पंचायती राज संस्थाओं एवं नगरीय निकायों में आरक्षण व्यवस्था ने महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ावा दिया है, जिससे स्थानीय स्तर पर नेतृत्व के नए आयाम विकसित हुए हैं। इस शोध-पत्र का उद्देश्य महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता और नारी सशक्तिकरण के मध्य संबंध का विश्लेषण करना, प्रमुख चुनौतियों की पहचान करना तथा उनके समाधान प्रस्तुत करना है। अध्ययन द्वितीयक स्रोतों—पुस्तकों, शोध-पत्रों, सरकारी रिपोर्टों तथा निर्वाचन संबंधी आँकड़ों—पर आधारित है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता में वृद्धि से लोकतांत्रिक शासन अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी और जनहितकारी बनता है। साथ ही शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता, राजनीतिक प्रशिक्षण तथा सामाजिक जागरूकता महिलाओं के वास्तविक सशक्तिकरण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
– भारत का संविधान।
– बी. आर. आंबेडकर – संविधान सभा के भाषण।
– अमर्त्य सेन – Development as Freedom।
– एम. लक्ष्मीकांत – भारतीय राजव्यवस्था।
– पंचायती राज मंत्रालय, भारत सरकार की विभिन्न रिपोर्टें।
– भारत निर्वाचन आयोग की वार्षिक रिपोर्टें।
– नीति आयोग की रिपोर्टें।
– महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार की रिपोर्टें।
– यूजीसी-केयर सूचीबद्ध शोध-पत्र एवं राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाएँ।
– महिला नेतृत्व, लोकतंत्र एवं सुशासन से संबंधित प्रकाशित शोध-ग्रंथ
प्रदीप कुमार सोनी
13-20
10.5281/zenodo.21967463
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