AD EDUXIAN JOURNAL

(A QUARTERLY MULTIDISCIPLINARY BLIND PEER REVIEWED & REFEREED ONLINE INTERNATIONAL JOURNAL)
YEAR: 2024 E- ISSN:3048-7951

परा एवं अपरा विद्या की शैक्षिक प्रासंगिकता

Acceptance: 08/09/2026

Published: 15/09/2026

Abstract

भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा को केवल पढ़ने-लिखने या किसी विषय का ज्ञान प्राप्त करने तक सीमित नहीं माना गया है। शिक्षा का संबंध मनुष्य के संपूर्ण जीवन से है। वह व्यक्ति को बाहरी संसार को समझने के साथ-साथ स्वयं को जानने, अपने विचारों को परिष्कृत करने और जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने की दिशा भी प्रदान करती है। इसी व्यापक दृष्टि में परा विद्या और अपरा विद्या की अवधारणा विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण दिखाई देती है। मुण्डक उपनिषद् में ज्ञान के इन दोनों रूपों का उल्लेख मिलता है। अपरा विद्या के अंतर्गत ऐसे ज्ञान को रखा गया है जो व्यक्ति को संसार, शास्त्रों और विभिन्न विषयों की समझ प्रदान करता है। यह ज्ञान जीवन को व्यवस्थित और व्यावहारिक बनाने में सहायक होता है। दूसरी ओर, परा विद्या वह ज्ञान है जो मनुष्य को उस परम सत्य की ओर ले जाता है जिसे उपनिषद् ‘अक्षर’ के रूप में स्वीकार करता है। इस प्रकार एक ओर अपरा विद्या बाहरी जीवन को समझने और सँवारने में सहायक है, तो दूसरी ओर परा विद्या व्यक्ति को अपने भीतर देखने की प्रेरणा देती है। आज की शिक्षा में विज्ञान, तकनीक, रोजगार और कौशल का महत्व लगातार बढ़ रहा है। यह आवश्यक भी है, क्योंकि इनके बिना आधुनिक जीवन की अनेक आवश्यकताओं को पूरा करना कठिन है। फिर भी केवल बाहरी उपलब्धियाँ मनुष्य को पूर्ण संतोष और सार्थक जीवन प्रदान कर सकें, यह आवश्यक नहीं। जीवन में विवेक, मूल्य, आत्मचेतना, संयम और मानवीय संवेदनाओं की भी आवश्यकता होती है। इसी संदर्भ में परा और अपरा विद्या की उपनिषद्-प्रदत्त अवधारणा आज भी विचारणीय है। दोनों के संतुलित समन्वय से ऐसी शिक्षा की कल्पना की जा सकती है जो व्यक्ति को केवल योग्य ही नहीं, बल्कि जिम्मेदार, विवेकशील, संवेदनशील और आत्मजागरूक मनुष्य बनाने में भी सहायक हो। प्रस्तुत शोध-पत्र इसी शैक्षिक दृष्टि को समझने और वर्तमान संदर्भ में उसकी उपयोगिता को स्पष्ट करने का प्रयास है।

Keynote: परा विद्या, अपरा विद्या, उपनिषद्, भारतीय ज्ञान परंपरा, शिक्षा, आत्मज्ञान, मूल्य शिक्षा, समग्र विकास।

Author Name:

प्रिया त्रिपाठी ; प्रो. नन्दलाल मिश्रा

Pages:

397-403

DOI Number:

10.5281/zenodo.23307459

Country:

Orcid:

Full Article

Reference

भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा को केवल पढ़ने-लिखने या किसी विषय का ज्ञान प्राप्त करने तक सीमित नहीं माना गया है। शिक्षा का संबंध मनुष्य के संपूर्ण जीवन से है। वह व्यक्ति को बाहरी संसार को समझने के साथ-साथ स्वयं को जानने, अपने विचारों को परिष्कृत करने और जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने की दिशा भी प्रदान करती है। इसी व्यापक दृष्टि में परा विद्या और अपरा विद्या की अवधारणा विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण दिखाई देती है। मुण्डक उपनिषद् में ज्ञान के इन दोनों रूपों का उल्लेख मिलता है। अपरा विद्या के अंतर्गत ऐसे ज्ञान को रखा गया है जो व्यक्ति को संसार, शास्त्रों और विभिन्न विषयों की समझ प्रदान करता है। यह ज्ञान जीवन को व्यवस्थित और व्यावहारिक बनाने में सहायक होता है। दूसरी ओर, परा विद्या वह ज्ञान है जो मनुष्य को उस परम सत्य की ओर ले जाता है जिसे उपनिषद् ‘अक्षर’ के रूप में स्वीकार करता है। इस प्रकार एक ओर अपरा विद्या बाहरी जीवन को समझने और सँवारने में सहायक है, तो दूसरी ओर परा विद्या व्यक्ति को अपने भीतर देखने की प्रेरणा देती है। आज की शिक्षा में विज्ञान, तकनीक, रोजगार और कौशल का महत्व लगातार बढ़ रहा है। यह आवश्यक भी है, क्योंकि इनके बिना आधुनिक जीवन की अनेक आवश्यकताओं को पूरा करना कठिन है। फिर भी केवल बाहरी उपलब्धियाँ मनुष्य को पूर्ण संतोष और सार्थक जीवन प्रदान कर सकें, यह आवश्यक नहीं। जीवन में विवेक, मूल्य, आत्मचेतना, संयम और मानवीय संवेदनाओं की भी आवश्यकता होती है। इसी संदर्भ में परा और अपरा विद्या की उपनिषद्-प्रदत्त अवधारणा आज भी विचारणीय है। दोनों के संतुलित समन्वय से ऐसी शिक्षा की कल्पना की जा सकती है जो व्यक्ति को केवल योग्य ही नहीं, बल्कि जिम्मेदार, विवेकशील, संवेदनशील और आत्मजागरूक मनुष्य बनाने में भी सहायक हो। प्रस्तुत शोध-पत्र इसी शैक्षिक दृष्टि को समझने और वर्तमान संदर्भ में उसकी उपयोगिता को स्पष्ट करने का प्रयास है।

Writer Name

प्रिया त्रिपाठी ; प्रो. नन्दलाल मिश्रा

Pages

397-403

DOI Numbers

10.5281/zenodo.23307459

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