बहुआयामी समाज में सूचनाओं का महत्व हमेशा से रहा है। सूचनाओं के कई आयाम और प्रकार होते हैं जो समाज के अलग अलग वर्गों के लिए कार्य करते हैं। सूचनाएँ कैसे बनती हंै और वो कितनी सत्य है इसको लेकर हमेशा से ही मतभेद रहा है। यूवल नोअ हरारी ने अपनी किताब (नेक्सस) में सूचनाओं के इतिहास और उसके बदलते आयामों पर चर्चा की है। उनके अनुसार कोई डाटा तब सूचना कहलाती है जब लोग उसका उपयोग सत्य को जानने या खोजने के लिए करते हैं। यह दृष्टिकोण सूचना की अवधारणा को सत्य की अवधारणा से जोड़ता है और यह मानता है कि सूचना की मुख्य भूमिका वास्तविकता का प्रतिनिधित्व करना है। सत्य वास्तविकता का पूर्णतः प्रतिनिधित्व नहीं होता। बल्कि सत्य वह होता है जो हमारी ध्यान दृृष्टि को वास्तविकता के कुछ पहलुओं की ओर आकर्षित करता है। वास्तविकता का कोई भी विवरण सौ प्रतिशत सटीक नहीं होता, लेकिन इसके बावजूद कुछ विवरण दूसरों की तुलना में अधिक सत्य के निकट होते हंै। सस्थांगत न्यूज मीडिया ने बीते आठ-दस दशकों में एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया है जिसमें घटनाओं, कार्यक्रमों और प्रंसगों के बारे में जानकारियां इकट्ठा करना, उनका सत्यापन और उनका प्रस्तुतीकरण लोकतांत्रिक देशों में सूचनाओं का एक ईकोसिस्टम तैयार हुआ। संस्थागत न्यूज मीडिया ने सूचना को समाजिक हित की अवधारणा से जोड़ा, निष्पक्ष सूचनाओं को सुनिश्चित करने के लिए बहु-स्तरीय जाँच और अवधारणा से जोड़ा, निष्पक्ष, गुणवत्ता और विविधता को सुनिश्चित किया। संस्थागत न्यूज मीडिया पर बहुत सारे दबाव भी थे जिस वजह से इसकी प्रामाणिकता पर सवाल उठते रहे हंै। आज जब वैकल्पिक मीडिया या कहें इंटरनेट आधारित मीडिया पूरी तरह से अपना स्थान बना चुका है और सूचनाओं का संग्रहण और निर्माण और उसका प्रसारण करना बेहद आसान हो गया है तब यह शोधपत्र दोबारा से इस बात की जाँच करता है कि लोकतांत्रिक समाज में सूचनाएँ जो कि व्यक्ति के अधिकारों, उसकी जीविका, उसके सरकार से संबंध और उसके नागरिक होने के विचार से संबंधित हैं और जिसके लिए एक सामान्य समझ समाज के बीच बनना जरूरी है, उन परिस्थितियों में एल्गोरिदम आधारित टैकनोलजी जो लोगों को आभासी समुदायों में उलझाकर भिन्न सूचनाएँ और मत उन तक नहीं आने दे रही है, वहाँ नागरिकों के बीच एक सामान्य समझ और सर्वसम्मति कैसे बनेगी? संस्थागत समाचार मीडिया और एल्गोरिदम आधारित वैकल्पिक मीडिया दोनों के अपने अपने गुण दोष हंै, लेकिन इस शोधपत्र में सेकेंडरी आँकड़ों के आधार पर इस बात का विश्लेषण किया गया है कि लोकतंत्र में सूचना और उसके आधार पर समाचार बनाने और उसको प्रस्तुत करने की जो प्रक्रिया जरूरी हैं, ताकि नागरिक अपनी एक समझ बना सके व लोकतांत्रिक निर्णय-निर्माण में भाग ले सकें, उसमें इन दोनों मीडिया में से कौनसा ज्यादा प्रभावी है।
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डाॅ. अमरदीप & डाॅ. प्रदीप कुमार
71-78
10.5281/zenodo.22037070
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