मानव सभ्यता के विकास का मूल आधार ज्ञान रहा है, और ज्ञान की इस निरंतर यात्रा में शोध (Research) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। शोध वह सुव्यवस्थित, तर्कसंगत तथा वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से मनुष्य किसी समस्या, तथ्य, घटना या सिद्धांत के बारे में सत्य का अन्वेषण करता है। समाज, शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, अर्थव्यवस्था, मनोविज्ञान और प्रबंधन जैसे विविध क्षेत्रों में होने वाली प्रगति और नवाचारों का मूल स्रोत शोध ही है। वास्तव में, शोध मानव बुद्धि की वह जिज्ञासा है जो यथार्थ की समझ को विस्तृत करती है तथा नई संभावनाओं के द्वार खोलती है। समकालीन वैश्विक परिप्रेक्ष्य में शोध का महत्व और भी व्यापक हो गया है। बदलती सामाजिक संरचनाएँ, जटिल होती समस्याएँ, तेजी से विकसित होती तकनीक, तथा विभिन्न ज्ञान-विषयों का अंतः विषयक (Interdisciplinary) विस्तार शोध की नई दिशाएँ निर्धारित कर रहा है। आज शोध केवल अकादमिक दस्तावेज़ या वैज्ञानिक प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है, बल्कि नीतिनिर्माण, नवाचार, उद्योग, सामाजिक सुधार और मानव विकास के लिए यह आधारभूत शक्ति बन चुका है। शोध का लक्ष्य केवल नए तथ्यों की खोज करना ही नहीं, बल्कि उपलब्ध ज्ञान की आलोचनात्मक समीक्षा, परीक्षण, सत्यापन और पुनर्परिभाषा करना भी है।
शोध के अर्थ, प्रकृति और उद्देश्य को समझने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण का ज्ञान अत्यंत अनिवार्य है। शोध एक उद्देश्यपूर्ण, नियंत्रित, संगठित और व्यवस्थित प्रक्रिया है जिसमें तार्किक चरणों के माध्यम से समस्या का अध्ययन किया जाता है और निष्कर्ष प्राप्त किए जाते हैं। शोध की वैज्ञानिकता को स्वरूप देने में प्रत्यक्षवाद (Positivism) और उत्तर-प्रत्यक्षवाद (Post-Positivism) जैसी दार्शनिक धाराओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। प्रत्यक्षवाद ज्ञान को अवलोकनीय, मापन योग्य और अनुभवजन्य (empirical) प्रमाणों पर आधारित मानता है, जबकि उत्तर-प्रत्यक्षवाद इस सीमा को विस्तृत करते हुए यह स्वीकार करता है कि सत्य बहुआयामी, संदर्भ-निर्भर और व्याख्यात्मक भी हो सकता है। साथ ही, यह भी मानता है कि शोधकर्ता स्वयं शोध-प्रक्रिया का हिस्सा होने के कारण कुछ स्तर तक शोध को प्रभावित करता है। इन दोनों दार्शनिक प्रवृत्तियों ने शोध की दिशा, रूपरेखा और विधियों को गहराई से प्रभावित किया है।