प्रस्तुत शोध-पत्र में प्रशिक्षण महाविद्यालयों में अध्ययनरत प्रशिक्षुओं के शिक्षण-प्रशिक्षण के प्रसार एवं उसकी गुणवत्तता का अध्ययन किया गया है। शिक्षा किसी भी राष्ट्र के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक विकास का आधार होती है तथा अध्यापक इस प्रक्रिया के प्रमुख संवाहक होते हैं। एक योग्य एवं कुशल अध्यापक के निर्माण में शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। शोध-पत्र में स्वतंत्रता के पश्चात् शिक्षा प्रणाली में सुधार हेतु गठित विभिन्न आयोगों एवं समितियों, जैसे—कोठारी आयोग, न्यायमूर्ति वर्मा समिति तथा टी.एस.आर. सुब्रमण्यम समिति आदि के सुझावों एवं योगदानों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षक-प्रशिक्षण के माध्यम से ही सक्षम, उत्तरदायी एवं नवाचारी अध्यापकों का निर्माण संभव है। वर्तमान वैश्वीकरण एवं बदलती सामाजिक आवश्यकताओं के संदर्भ में शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों को आधुनिक, शोधपरक एवं व्यावसायिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि शिक्षण-प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार राष्ट्र निर्माण, शैक्षिक उन्नति तथा भावी पीढ़ी के समग्र विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
अग्रवाल, जे. सी., 2009, रिसेंट डेवलपमेंट एंड ट्रेंड्स इन एजुकेशन, शिप्रा पब्लिकेशन, दिल्ली।
एन.सी.ई.आर.टी. 2006, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005, नई दिल्ली।
एम.एच.आर.डी. 1993, लर्निंग विदाउट बर्डन (यशपाल रिपोर्ट), नई दिल्ली।
डॉ० चन्द्र भूषण कुमार
192-195
10.5281/zenodo.20213850
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