भारतीय शास्त्रीय संगीत में स्वर-अभ्यास की परंपरा का विशेष महत्त्व रहा है। किसी भी विद्यार्थी के लिए राग, बंदिश अथवा स्वतंत्र संगीत-प्रस्तुति सीखने से पहले स्वरों की सही पहचान, उनके क्रम और आपसी संबंध को समझना आवश्यक होता है। स्वर-अलंकार इसी आधार को मजबूत करने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है। इसमें स्वरों को विभिन्न क्रमों, समूहों और लयों में गाने अथवा बजाने का अभ्यास किया जाता है। यह अभ्यास केवल स्वरों को याद करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि स्वर की शुद्धता, श्रवण-क्षमता, लयबोध, आवाज अथवा वाद्ययंत्र पर नियंत्रण और संगीतात्मक अभिव्यक्ति को विकसित करने में भी सहायक होता है। भारतीय संगीत की अलग-अलग परंपराओं में स्वर-अभ्यास के विविध रूप मिलते हैं। हिंदुस्तानी संगीत में अलंकार और पलटे तथा कर्नाटक संगीत में सरली वरिसै, जंटई वरिसै और धातु वरिसै इसके परिचित उदाहरण हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र में स्वर-अलंकार की अवधारणा, उसके प्रमुख प्रकार, अभ्यास की विधि तथा संगीत-शिक्षा में उसके महत्त्व का अध्ययन किया गया है। साथ ही, यह समझने का प्रयास किया गया है कि नियमित और सही पद्धति से किया गया अलंकार-अभ्यास किस प्रकार विद्यार्थी को संगीत की आगे की जटिल विधाओं के लिए तैयार करता है।
Śārṅgadeva. (1978). Saṅgīta-Ratnākara, Vol. I: Treatment of Svara. English translation by Dr. R. K. Shringy under the supervision of Dr. Premlata Sharma. Motilal Banarsidass, Delhi, Varanasi and Patna.
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डॉ. देवानंद पाठक
625-632
10.5281/zenodo.23843407
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