आधुनिक समय विकास और उत्थान का है। बढ़ती शिक्षा व्यवस्था ने लोगों को जागरूक किया है। यह जागरूकता एकदिश न होकर बहुदिश है। इसका परिणाम यह हुआ है कि लोग अन्धविश्वास, रूढ़िवादिता और पूर्वाग्रह पर बहुत चिंतन-मनन कर रहे हैं और सभी तथ्यों की विवेचना, वैज्ञानिक, तर्क-वितर्क और अपने अधकचरे ज्ञान के आधार पर करने लगे हैं। अपने देश में दो तरह के दर्शन आस्तिक और नास्तिक, सगुण और निर्गुण का आस्तित्व है। ‘मानोेेेेेेे तो देव नहीं तो पत्थर’ इस उक्ति का भी यही अर्थ है। हिन्दू धर्म में चार वर्ण की बात आती है और प्रथम वर्ण ब्राह्मण है। इसमें कोई संशय नहीं है कि हिन्दू संस्कृति और सनातक धर्म के ज्ञान के विस्तार में ब्राह्मणों की भूमिका सर्वोपरि है। ज्ञान का प्रकाश जितना ब्राह्मणों ने फैलाया वह अकाट्य है, शब्दों की सीमा में उसे बांधा नहीं जा सकता पर समय प्रवाह में बहुत सी बातें अप्रासंगिक भी हो गयी होंगी। किंतु अप्रासंगिकता को भी तर्क का आधार चाहिए। जिस समय हमारे उपनिषद्, स्मृतियाँ, पुराण आदि ग्रन्थ लिखे गये होंगे, उस समय ज्ञान अपने चरम पर था। हजारों वर्षों की गहन साधना से वह ज्ञान अर्जित किया गया होगा पर आज जो लोग आधुनिक समय की कसौटी पर उसे परख रहे हैं वे कहाँ खड़े हैं, इसका अन्दाजा उन्हें नहीं है। इसी परिप्रेक्ष्य में यहाँ एक प्रयास किया गया है कि गोस्वामी तुलसीदास ने श्री रामचरित मानस में ब्राह्मणों को किस रूप में लिया है तथा उनकी क्या-क्या भूमिकायें रहीं हैं और मृत्युलोक में ब्राह्मणों के कौन-कौन से गुण अनुकरणीय है तथा मानव मात्र के कल्याण के लिए उनका धर्म और कर्म क्या है।
1. श्री रामचरित मानस, गीताप्रेस, गोरखपुर।
2. मानस-पीयूष, महात्मा अंजनी नन्दन शरण।
3. मारुति टीका, आचार्य सीताराम चतुर्वेदी।
डाॅ. अनामिका अवस्थी और प्रो. एन.एल. मिश्र
51-61
10.5281/zenodo.22016002
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