यह शोध आलेख झारखंड के गुमला जिले में निवास करने वाली उराँव (कुरुख) जनजाति की सामाजिक संरचना एवं उसमें आए परिवर्तनों का एक समालोचनात्मक और बहुआयामी विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था—जिसमें परिवार, गोत्र, नातेदारी, ग्राम-संगठन, विवाह प्रणाली और सांस्कृतिक-धार्मिक प्रथाएँ शामिल हैं—आधुनिक सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के प्रभाव में किस प्रकार रूपांतरित हुई है। शोध से यह स्पष्ट होता है कि उराँव समाज ऐतिहासिक रूप से पितृवंशीय, गोत्र-आधारित और सामुदायिक जीवन-पद्धति पर आधारित रहा है, जहाँ ग्राम-स्तरीय संस्थाएँ तथा पारंपरिक नेतृत्व (जैसे महतो और पाहन) सामाजिक संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। किंतु शिक्षा के प्रसार, नगरीकरण, प्रवास, बाजार अर्थव्यवस्था, सरकारी योजनाओं तथा धार्मिक प्रभावों ने इस पारंपरिक संरचना को प्रभावित किया है। संयुक्त परिवारों के स्थान पर परमाणु परिवारों का बढ़ना, विवाह-प्रणाली में लचीलापन, स्त्रियों की सामाजिक भागीदारी में वृद्धि, तथा भाषा और सांस्कृतिक व्यवहार में परिवर्तन इस प्रक्रिया के प्रमुख संकेतक हैं। इसके बावजूद यह अध्ययन दर्शाता है कि उराँव समाज अपनी सांस्कृतिक पहचान—विशेषकर गोत्र व्यवस्था, पर्व-त्योहार, भाषा और सामुदायिक मूल्यों—को बनाए रखने का प्रयास कर रहा है। अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सामाजिक परिवर्तन यहाँ एक जटिल, बहुस्तरीय प्रक्रिया है, जिसमें परंपरा और आधुनिकता का सह-अस्तित्व विद्यमान है और दोनों के बीच संतुलन स्थापित करने की निरंतर कोशिश की जा रही है।
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मिंज, मेरी सरोज
518-521
10.5281/zenodo.19653292
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