AD EDUXIAN JOURNAL

(A QUARTERLY MULTIDISCIPLINARY BLIND PEER REVIEWED & REFEREED ONLINE INTERNATIONAL JOURNAL)

YEAR: 2024

E- ISSN:3048-7951

उत्तर-आधुनिकता और हिंदी साहित्य की नई संवेदना

Abstract

बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में औद्योगिक, तकनीकी और सामाजिक परिवर्तनों ने साहित्यिक संवेदनाओं को गहराई से प्रभावित किया। इन्हीं परिवर्तनों के बीच उत्तर-आधुनिकता एक ऐसी विचारधारा के रूप में उभरी, जो आधुनिकता के सार्वभौमिक सत्य, तर्क, स्थिर संरचनाओं और मानकों पर प्रश्नचिह्न लगाती है। ल्योटार्ड, फौकॉल्ट और देरिदा जैसे विचारकों ने ‘मेटानैरेटिव’, शक्ति-संरचना और अर्थ की स्थिरता को चुनौती देकर इसे दार्शनिक आधार दिया। हिंदी साहित्य में उत्तरआधुनिक चेतना 1980 के बाद प्रमुखता से प्रकट हुई, जब उदारीकरण, तकनीकी विस्तार और बाज़ारवाद ने मनुष्य की पहचान और अनुभव को बदल दिया। इस युग में साहित्य का केंद्र ‘समूह’ की जगह ‘व्यक्ति’ बन गया—वह व्यक्ति जो भीड़ में अकेला और आंतरिक संघर्षों से घिरा है। कहानी, उपन्यास, कविता और नाटक में इस दौर में विविधता, विखंडन, अस्थिरता और आत्मनिरीक्षण की प्रवृत्तियाँ उभरती हैं। कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, निर्मल वर्मा, मन्नू भंडारी, उदय प्रकाश, चित्रा मुद्गल आदि लेखकों ने नए सामाजिक यथार्थ, हाशिए के अनुभव, पहचान के संकट और सांस्कृतिक तनावों को नए प्रारूप में प्रस्तुत किया। कविता में मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, अरुण कमल, अनामिका आदि ने तकनीकी युग की संवेदनात्मक चुनौतियों को स्वर दिया। नारीवाद और दलित साहित्य के उभार ने उत्तर-आधुनिक हिंदी साहित्य को नई दिशा दी, जहाँ देह, इच्छा, पहचान, संघर्ष और आत्मकथा नए विमर्श के रूप में उभरे। ओमप्रकाश वाल्मीकि की जूठन जैसी रचनाएँ इसी परिवर्तन का सशक्त उदाहरण हैं। भाषा के स्तर पर भी साहित्य अधिक बोलचाल, लोक-शैली और मीडिया-प्रभावित रूप में सामने आता है। इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों ने साहित्य को लोकतांत्रिक और तात्कालिक बनाया, जहाँ लेखक–पाठक दूरी कम हुई। हालांकि कुछ आलोचकों ने इसे मूल्य-संकट और व्यक्तिवाद को बढ़ावा देने वाला बताया, फिर भी इसकी बहुलता और विविधतापूर्ण दृष्टि ने हिंदी साहित्य को नई संवेदना और नई दिशा प्रदान की। इस प्रकार, उत्तर-आधुनिक हिंदी साहित्य अनेक सत्यों, अनेक अनुभवों और अनेक आवाज़ों का साहित्य है—जो समकालीन युग की जटिलताओं, विखंडनों और बदलावों का प्रामाणिक दर्पण है।

Keynote: बहुलता व्यक्ति-केंद्रित नया प्रयोग नारीवाद/दलित आवाज़ भाषा और डिजिटल।

Acceptance: 01/11/2025

Published: 19/11/2025

Writer Name

डॉ. पायल

Pages

170-175

DOI Numbers

10.5281/zenodo.17645160