प्रस्तुत अध्ययन भारतीय वाङ्मय के ‘अंतःकरण’ व आधुनिक मनोविज्ञान के ‘संज्ञान’ की अवधारणा से सम्बन्धित है। मानव व्यवहार की जटिलताओं को देखते हुए इसके विभिन्न पहलुओं पर ध्यान केन्द्रित किया गया। व्यवहार के विविध प्रारूपों ने वर्तमान विषय पर सोचने को विवश किया। यह देखा गया है कि एक व्यक्ति बताए और सिखाए गए कार्य को भी ठीक से नहीं कर पाता, जबकि दूसरा व्यक्ति बिना कुछ बताए अपनी बुद्धि के सदृश कृत्रिम बुद्धि (ए.आई.) को तैयार कर देता है। तो शून्य निष्पादन से लेकर स्पेस अनुसंधान तक विस्तारित मानव संज्ञान अथवा उसका अंतःकरण कितनी असीमित ऊर्जा वाला होगा, यह एक विचारणीय मुद्दा है। इस तरह अंतःकरण की शक्ति और संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं की गूढ़ता इस शोध-विषय का केन्द्रीय तत्व है। दोनों सम्प्रत्ययों की साम्यता की सीमा और विभेद को भी समझने का प्रयास किया गया है। तंत्रिका-विज्ञान की भूमिका को खंगालने का कार्य हुआ है, ताकि इनके अन्तर्सम्बन्धों को जाना जा सके। अन्ततः एक समन्वयात्मक दृष्टिकोण का सुझाव भी इस शोध-पत्र की एक उपलब्धि है।
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प्रो. एन. एल. मिश्र
267-274
10.5281/zenodo.23099371
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