AD EDUXIAN JOURNAL

(A QUARTERLY MULTIDISCIPLINARY BLIND PEER REVIEWED & REFEREED ONLINE INTERNATIONAL JOURNAL)
YEAR: 2024 E- ISSN:3048-7951

श्री रामचरितमानस में ब्राह्मण वर्णन: एक अनुशीलन

Acceptance: 08/07/2026

Published: 19/08/2026

Abstract

आधुनिक समय विकास और उत्थान का है। बढ़ती शिक्षा व्यवस्था ने लोगों को जागरूक किया है। यह जागरूकता एकदिश न होकर बहुदिश है। इसका परिणाम यह हुआ है कि लोग अन्धविश्वास, रूढ़िवादिता और पूर्वाग्रह पर बहुत चिंतन-मनन कर रहे हैं और सभी तथ्यों की विवेचना, वैज्ञानिक, तर्क-वितर्क और अपने अधकचरे ज्ञान के आधार पर करने लगे हैं। अपने देश में दो तरह के दर्शन आस्तिक और नास्तिक, सगुण और निर्गुण का आस्तित्व है। ‘मानोेेेेेेे तो देव नहीं तो पत्थर’ इस उक्ति का भी यही अर्थ है। हिन्दू धर्म में चार वर्ण की बात आती है और प्रथम वर्ण ब्राह्मण है। इसमें कोई संशय नहीं है कि हिन्दू संस्कृति और सनातक धर्म के ज्ञान के विस्तार में ब्राह्मणों की भूमिका सर्वोपरि है। ज्ञान का प्रकाश जितना ब्राह्मणों ने फैलाया वह अकाट्य है, शब्दों की सीमा में उसे बांधा नहीं जा सकता पर समय प्रवाह में बहुत सी बातें अप्रासंगिक भी हो गयी होंगी। किंतु अप्रासंगिकता को भी तर्क का आधार चाहिए। जिस समय हमारे उपनिषद्, स्मृतियाँ, पुराण आदि ग्रन्थ लिखे गये होंगे, उस समय ज्ञान अपने चरम पर था। हजारों वर्षों की गहन साधना से वह ज्ञान अर्जित किया गया होगा पर आज जो लोग आधुनिक समय की कसौटी पर उसे परख रहे हैं वे कहाँ खड़े हैं, इसका अन्दाजा उन्हें नहीं है। इसी परिप्रेक्ष्य में यहाँ एक प्रयास किया गया है कि गोस्वामी तुलसीदास ने श्री रामचरित मानस में ब्राह्मणों को किस रूप में लिया है तथा उनकी क्या-क्या भूमिकायें रहीं हैं और मृत्युलोक में ब्राह्मणों के कौन-कौन से गुण अनुकरणीय है तथा मानव मात्र के कल्याण के लिए उनका धर्म और कर्म क्या है।

Keynote: ब्राह्मण, द्विज, कर्म, धर्म, प्रत्यक्षीकरण, प्रासंगिकता।

Author Name:

डाॅ. अनामिका अवस्थी और प्रो. एन.एल. मिश्र

Pages:

51-61

DOI Number:

10.5281/zenodo.22016002

Keyword:

ब्राह्मण, द्विज, कर्म, धर्म, प्रत्यक्षीकरण, प्रासंगिकता।

Reference

1. श्री रामचरित मानस, गीताप्रेस, गोरखपुर।
2. मानस-पीयूष, महात्मा अंजनी नन्दन शरण।
3. मारुति टीका, आचार्य सीताराम चतुर्वेदी।

Writer Name

डाॅ. अनामिका अवस्थी और प्रो. एन.एल. मिश्र

Pages

51-61

DOI Numbers

10.5281/zenodo.22016002

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