AD EDUXIAN JOURNAL

(A QUARTERLY MULTIDISCIPLINARY BLIND PEER REVIEWED & REFEREED ONLINE INTERNATIONAL JOURNAL)
YEAR: 2024 E- ISSN:3048-7951

आलोचना की परंपरा और स्त्री लेखन

Acceptance: 08/07/2026

Published: 24/07/2026

Abstract

यह शोध-पत्र हिन्दी साहित्य में स्त्री लेखन, स्त्री अस्मिता और स्त्रीवादी आलोचना के विकास का ऐतिहासिक एवं वैचारिक अध्ययन प्रस्तुत करता है। परंपरागत पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्रियों को लंबे समय तक वैचारिक रूप से निर्बल और साहित्यिक सृजन के क्षेत्र में गौण माना गया। इसके बावजूद मैत्रेयी, गार्गी, मीरा, अज्ञात हिन्दू महिला, बंग महिला, महादेवी वर्मा आदि रचनाकारों के माध्यम से स्त्री लेखन की एक सशक्त परंपरा विकसित हुई। आधुनिक काल में स्त्री लेखन ने न केवल साहित्य में स्त्री की उपस्थिति को स्थापित किया, बल्कि पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण, सामाजिक रूढ़ियों और स्त्री की अधीनता पर भी गंभीर प्रश्न उठाए। निर्मला जैन, अनामिका, प्रभा खेतान, रोहिणी अग्रवाल, मृणाल पांडे, मृदुला गर्ग और अन्य लेखिकाओं ने स्त्री आलोचना को वैचारिक आधार प्रदान किया। इस अध्ययन में स्त्री लेखन को केवल स्त्रियों द्वारा रचित साहित्य के रूप में नहीं, बल्कि स्त्री की अस्मिता, स्वतंत्रता, समानता और मानवीय अधिकारों की वैचारिक खोज के रूप में देखा गया है। लेख का निष्कर्ष है कि स्त्री लेखन हिन्दी साहित्य की एक स्वतंत्र, मौलिक और आवश्यक वैचारिक धारा है, जिसके माध्यम से स्त्री को ‘अन्य’ के रूप में देखने वाली पितृसत्तात्मक दृष्टि का प्रतिरोध करते हुए उसे पूर्ण मानव के रूप में स्थापित किया जा सकता है।

Author Name:

रश्मि ; डॉ० अनिल कुमार

Pages:

702-706

DOI Number:

10.5281/zenodo.21534295

Reference

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Writer Name

रश्मि ; डॉ० अनिल कुमार

Pages

702-706

DOI Numbers

10.5281/zenodo.21534295

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