AD EDUXIAN JOURNAL

(A QUARTERLY MULTIDISCIPLINARY BLIND PEER REVIEWED & REFEREED ONLINE INTERNATIONAL JOURNAL)
YEAR: 2024 E- ISSN:3048-7951

स्वामी विवेकानन्द के नव्य वेदान्त में निहित तत्वों का अध्ययन

Acceptance: 04/05/2026

Published: 30/05/2026

Abstract

स्वामी विवेकानन्द जी भारत के ज्ञान रत्न भण्डार, वेदों और उपनिषदों के रहस्योदेयक्ता और भाष्यकार के रूप में मान्य है। स्वामी जी का जीवन में वेदान्त दर्शन नव्य वेदान्त की स्पष्ट छाप दृष्टिगोचर होती है। वे वेदान्त दर्शन के अनुयायी थे और वेदान्त को सर्वोच्च दर्शन एवं सर्वोच्च धर्म मानते थे। वे अद्वैत वेदान्त के पक्के समर्थक थे। वे द्वैत विशिष्ट दैत तथा अद्वैत में कोई अन्तर नहीं थे वे सभी भारतीय दार्शनिकों सम्प्रदायों को वेदान्त दर्शन के अन्तर्गत मानते है। उन्होंने वेदान्त की विशेषता के सम्बन्ध में लिखा है कि एकम सदविपा बहुधा वदन्ति, उतिष्ठत, जागृत, प्राप्वर्रानिन्वबोधात् सम पश्यन हि सर्वत्र, सम विस्थितमीश्वरम नहि नस्त्यात्मनं ततो याति परांगति, भिन्नता में एकता, द्वैतवाद की अपेक्षा अद्वैतवाद का समर्थन, आत्म विश्वास की उन्नति का कारण द्वैतभावना वादी अविद्या आदि। सृष्टि के सम्बन्ध में उनका कहना है कि सृष्टि के सुत्रपात के समय आकाश अत्यक्त और स्थिर रहता है। वाद में आदि शक्ति का प्रभाव आकाश पर पड़ता है। परिणामतः वह क्रियाशीलता होने लगता है क्रियाशील होने पर मनुष्य पेड़-पौधे नक्षत्र और पशु आदि का जन्म होता है। ईश्वर को साकार एवं निराकार दोनों रूपों में मानते है तथा ऊँ का ब्रह्म मानते है। स्वामी जी के अनुसार मानव सेवा और ईश्वर पूजा, मनुष्यत्व और धर्म, सत्य निष्ठता और आध्यात्मिकता में कोई भेद नहीं है। उन्होंने ब्रह्म की प्राप्ति के लिए कर्मयोग, भक्तियोग, राजयोग तथा ज्ञानयोग को प्रमुख माना है। धर्म के सम्बन्ध में उनका कहना है कि धर्म वह तथ्य है जिससे पशु मनुष्य तक और मनुष्य परमात्मा तक उठ सकता है। प्रत्येक जीव की भलाई करना ही धर्म है। पुनर्जन्म के सम्बन्ध में उनका विचार है कि वर्तमान अस्तित्व को समझने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि उसके अतीत एवं भविष्य पर विचार किया जाये। एकेश्वरवाद में विश्वास रखते हुए स्वामी जी का कहना है कि सभी देवता एक ही परमेश्वर के रूप हैं उन्होंने प्राचीन वेदान्त दर्शन पर नव्य वेदान्त दर्शन का रूप दिया। स्वामी जी वेदान्त एवं विज्ञान दोनों को समान सिद्धान्त को मानते है। वे प्रेम सत्य एवं ईश्वर को एक ही मानते है। स्वर्ग एवं नरक के सम्बन्ध में उनका मानना था कि कहीं स्वर्ग है तो कहीं नरक है भी ईश्वर जगत और माया के विषय में कहते हैं कि ब्रह्म जगत का कारण है और जगत इसका कारण है। ईश्वर की बीज शक्ति का नाम माया है। माया परमेश्वर की अव्यक्ति शक्ति हैं माया सत्य का नाम माया है। माया परमेश्वर की अव्यक्त शक्ति है माया सत भी नहीं हैं असत् भी नहीं वह केवल अद्भुत एवं अनिर्वचनीय है। आत्मा अजर और अमर है तथा वह पूर्ण निरपेक्ष होती है जब आत्मपूर्ण व निरपेक्ष हो जाती है तब वह ब्रह्म के साथ एक हो जाती है तथा ईश्वर को अपने स्वरूप की पूर्णता सत्यता और सत्ता के रूप परमसत् परमचित, परमानन्द के रूप प्रत्यक्ष करती है।

Author Name:

संतोष कुमार सिंह ; प्रो० (डॉ०) योगेश कुमार

Pages:

240-248

DOI Number:

10.5281/zenodo.20453516

Reference

1- स्वामी विवेकानन्द की सम्पूर्ण कृतियाँ 1991, मायावती मेमोरियल एडीशन वॉल्यूम-।।, अद्धैत आश्रम, कलकत्ता, पृ0 15
2- स्वामी विवेकानन्द की सम्पूर्ण रचनाएँ 1995, मायावती मेमोरियल एडीशन, वॉल्यूम-5 अद्धैत आश्रम, कलकत्ता।
3- राम सकल पाण्डेय, 1995, भारत के महान शिक्षाशास्त्री, अग्रवाल पब्लिकेशन आगरा।
4- राम सकल पाण्डेय, शिक्षा के दार्शनिक सिद्धान्त, अग्रवाल पब्लिकेशन, आगरा।
5- डॉ0 एस0एस0 मिश्र 2011 स्वामी विवेकानन्द शिक्षादर्शन शारदा पुस्तक भवन, इलाहाबाद।
6- अग्रवाल, एस0के0- शिक्षा के तत्कालीन सिद्धान्त पब्लिकेशन हाउस, मेरठ।
7- पाठक पी0डी0- भारतीय शिक्षा का विकास
8- स्वामी विवेकानन्द साहित्य- नवाँ संस्करण, अद्धैत आश्रम 5 डीही एण्टाली रोड कलकत्ता।
9- स्वामी विवेकानन्द साहित्य- आठवाँ संस्करण, अद्धैत आश्रम
10- श्रीमदभगवत गीता- गीता प्रेस, गोरखपुर।
11- त्यागी गुरूशरण दास एवं नन्द विजय कुमार (2001)- उदीयमान भारत में शिक्षा, विनोद पुस्तक मन्दिर, आगरा।
12- मानव चेतना, राजर्षि टण्डन ओपेन यूनिर्वसिटी, प्रयागराज।

Writer Name

संतोष कुमार सिंह ; प्रो० (डॉ०) योगेश कुमार

Pages

240-248

DOI Numbers

10.5281/zenodo.20453516

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