यह आलेख 'हाशिए का समाज : भाषा और साहित्य' हाशियाकृत समुदायों के भाषा और साहित्य के परिपेक्ष में सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक स्थिति का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह समाज सदियों से मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित रहा है।समाज में व्याप्त वर्चस्ववादी शक्तियों ने इनके भाषा और साहित्य को मुख्यधारा के साहित्य में उचित स्थान नहीं दिया, जबकि इनकी भाषा में समाज के सभी प्रतिमान विद्यमान है जिस पर चलकर व्यक्ति ने समाज का वर्तमान स्वरूप प्राप्त किया है। इसके जीवंत उदाहरण दलित, आदिवासी, स्त्री लेखन में दिखाई देते हैं।
पीली छतरी वाली लड़की-उदय प्रकाश, पृष्ठ संख्या-14, संस्करण-2014, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
छतरी-ओमप्रकाश वाल्मीकि, प्रथम संस्करण-2013, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली।
छतरी-ओमप्रकाश वाल्मीकि, पृष्ठ संख्या-21, संस्करण-2013, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली।
मुर्दहिया-डॉ. तुलसीराम, पृष्ठ संख्या-11, संस्करण-2010, राजकमल प्रकाशन, इलाहाबाद।
मूकजनों की वाणी : भारतीय दलित साहित्य, संपादक- सोमा बंधोपाध्याय, पृष्ठ संख्या-172, संस्करण- 2017, साहित्य भंडार, इलाहाबाद।
गुड़िया भीतर गुड़िया-मैत्री पुष्पा, पृष्ठ संख्या-12, संस्करण-2009, राजकमल प्रकाशन इलाहाबाद।
समय से मुठभेड़-अदम गोंडवी, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
दलित विमर्श एवं हिंदी दलित काव्य, संपादक-प्रोफेसर कालीचरण स्नेही, पृष्ठ संख्या-7, प्रकाशक- न्यू रॉयल बुक डिपो, लखनऊ।
दलित विमर्श : साहित्य के आईने में, डॉक्टर जयप्रकाश कर्दम, पृष्ठ संख्या-16, संस्करण-2009, प्रकाशन- साहित्य संस्थान, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।
दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, ओमप्रकाश वाल्मीकि, पृष्ठ संख्या-81, संस्करण-2015, प्रकाशन- राधा कृष्ण प्रकाशन, दिल्ली।
संतोष कुमार
111-116
10.5281/zenodo.22099624
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