यह लेख विशिष्ट बालक एवं विशिष्ट शिक्षा की अवधारणा पर केंद्रित है। इसमें विशिष्ट बालकों की परिभाषा, उनकी विशेषताएँ तथा उनकी सामाजिक एवं भावनात्मक समस्याओं का विश्लेषण किया गया है। विशिष्ट बालक वे होते हैं जो शारीरिक, मानसिक, सामाजिक या भावनात्मक दृष्टि से सामान्य बच्चों से भिन्न होते हैं और उनके समुचित विकास के लिए विशेष प्रकार की शिक्षा की आवश्यकता होती है। लेख में यह स्पष्ट किया गया है कि ऐसे बच्चों को आत्मविश्वास, समान अवसर, व्यक्तिगत शिक्षण तथा जीवनोपयोगी शिक्षा प्रदान करना अत्यंत आवश्यक है। साथ ही, राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रावधानों के माध्यम से यह बताया गया है कि विशिष्ट बालकों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए समावेशी शिक्षा और विशेष सुविधाओं का प्रावधान किया जाना चाहिए। अंततः, शिक्षक की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि उनके व्यवहार, दृष्टिकोण और शिक्षण पद्धति से ही इन बच्चों के व्यक्तित्व और भविष्य का निर्माण होता है। इस प्रकार, उचित शिक्षा, संवेदनशील दृष्टिकोण और सहायक वातावरण के माध्यम से विशिष्ट बालकों का समग्र विकास संभव है।
अग्रवाल, जे. सी. — भारत में विशिष्ट बालकों की शिक्षा।
कुप्पुस्वामी, बी. — एडवांस्ड एजुकेशनल साइकोलॉजी।
सिंह, डी. पी. — विशिष्ट बालक: उनकी समस्याएँ एवं पुनर्वास।
नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) — समावेशी शिक्षा से संबंधित प्रकाशन।
भारतीय पुनर्वास परिषद (RCI) — विशेष शिक्षा के नियम एवं दिशा-निर्देश।
डॉ. श्यामा मुखर्जी — विशिष्ट बालक: अर्थ एवं विशेषताएँ, विश्वविद्यालय रांची।
Rehabilitation Journals — विशिष्ट शिक्षा अधिनियम।
ResearchGate — विशिष्ट बालकों की शैक्षिक उपलब्धियों में डिजिटल शिक्षा की भूमिका।
मिश्रा, डॉ. रुचि
419-422
10.5281/zenodo.19333134
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