अठारहवीं सदी का उत्तरार्ध भारतीय इतिहास में विघटन, संघर्ष और सत्ता के नए रूपों का समय था। इस युग में जब मुग़ल साम्राज्य बिखर रहा था और अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी अपने प्रभाव का विस्तार कर रही थी, तब उत्तर भारत की राजनीतिक और सैन्य परिदृश्य में एक महिला शासिका ‘बेगम समरू’ का उदय हुआ। एक निर्धन और असुरक्षित जीवन से आरंभ कर सरधना की जागीर की सर्वेसर्वा बनने तक की उनकी यात्रा असाधारण है। इस शोधपत्र में उनके व्यक्तित्व के प्रखर पक्ष का अध्ययन किया गया है, जिसमें सत्ता का संचालन, सैन्य नेतृत्व, कूटनीति, धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक संरक्षण शामिल हैं। लेख मुख्य रूप से राजगोपाल सिंह वर्मा की पुस्तक बेगम समरू का सच पर आधारित है, साथ ही अन्य इतिहासकारों ब्रजेंद्रनाथ बनर्जी और महेंद्रनाथ शर्मा की कृतियों से भी पूरक सामग्री ली गई है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि बेगम समरू केवल एक क्षेत्रीय शासिका नहीं थीं, बल्कि भारतीय इतिहास में महिला नेतृत्व की संभावनाओं का जीवंत प्रतीक थीं।
प्राथमिक स्रोत: वर्मा, राजगोपाल सिंह। बेगम समरू का सच। मेरठ: संवाद प्रकाशन, 2019।
द्वितीयक स्रोत” बैनर्जी, ब्रजेंद्रनाथ। बेगम समरू। कलकत्ता: कलकत्ता विश्वविद्यालय, 1925।
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निशा & डॉ० सीमा शर्मा
312-322
10.5281/zenodo.19140327
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