छायावादी साहित्य में रहस्यवाद, दर्शन और आत्मानुभूति और रहस्यवाद को मुख्य रुप से छायावाद का विषय माना गया है । जिसने हिंदी की कविताओं को दशा और दिशा दोनों देने का कार्य किया है । छायावादी साहित्य को हिंदी का काव्यांदोलन भी कहा गया है । इस दौरान भाषा का स्तर मधुर और आलंकारिक रहा है । भावनात्मक प्रधान भाषा ने मधुरता के रस में अपने को डूबाकर कोमलता का आभास कराया है । स्वतंत्र विचार सिद्धहस्त बन गए । सौंदर्य ने अपनी महत्वपूर्ण छाप छेड़ी । संगीत और अलंकारिकता को भाषा में प्रधानता प्राप्त हुयी । नारी का सौंदर्य अपनी उच्च सीमा पर रहा । सम्मान और श्रद्धा ने उच्चतम स्थान प्राप्त किया । इन सभी बातों को कविताओं में स्थान मिला । संवेदना और आध्यामिकता की बातें जुड़्ने लगी । यही वजह है कि काव्यात्मक्ता की प्रभावशालीता ने अपनी ऊँचाईयों को आसमानी पाया । अंग्रेजी और बंगाली भाषाओं का पुरजोर था । पारंपरिक काव्य शैली में परिवर्तन की गुंजाइश महसूस होने लगी । राष्ट्रीयता का असर दिखने लगा । आतंरिक अनुभवों को कवि ने कल्पनाशीलता की तर्ज पर रखकर कविताओं का आधार बनाया । कविताओं को प्रभावसाली बनाने हेतु छायावाद में प्रकृति को मानव जीवन से जोड़ दिया । व्यक्तिगत अनुभवों को भी कविता की विषय समाग्री से जोड़ दिया । छायावाद के चार स्तंभों में जयशंकर प्रसाद , सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ,सुमित्रानंदन पंत , और महादेवी वर्मा । जिस जयशंकर प्रसाद ने दर्शन और इतिहास को कविताओं में विषय बनाया वहीं निराला के स्वतंत्र अस्तित्व ,पंतजी के प्रकृति प्रेम और महादेवी वर्मा की संवेदनशील कविताएँ और भावनाएँ यहाँ दिखती है ।
डा.वी.तारा नायर
117-122
10.5281/zenodo.18666191
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